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Saturday, July 25, 2020

Bandit Queen फूलन थी इंस्पेक्टर और आइजी था मलखान, खाकी थी बीहड़ के डकैतों की वर्दी

Bandit Queen फूलन थी इंस्पेक्टर और आइजी था मलखान, खाकी थी बीहड़ के डकैतों की वर्दी.



कानपुर, [अनुराग मिश्र]। चंबल के बीहड़ों में दस्यु सुंदरी फूलनदेवी [Phoolan Devi] गिरोह भले ही अब इतिहास के पन्नों में सिमट गया हो लेकिन बेहमई की हवाओं में सन्नाटे के बीच आज भी उसके किए नरसंहार के बाद की चीखें सुनाई दे जाती हैं। सामूहिक दुष्कर्म का बदला लेने के लिए बंदूक उठाने वाली फूलन डकैत गिरोह का हिस्सा बनीं। बेहमई गांव में एक साथ बीस लोगों को मौत के घाट उतारने के बाद गिरोह ने उसे इंस्पेक्टर का पदनाम दिया, दरअसल गिरोह के डकैत न सिर्फ खाकी वर्दी पहनते थे बल्कि कांड करने के आधार पर पुलिस वालाें के पदनाम से संबोधित भी करते थे।

फूलन यूं बनी बैंडिट क्वीन

उत्तर प्रदेश के जालौन जनपद के गांव घूरा का पुरवा में 10 अगस्त 1963 को जन्मी नन्ही फूलन जुल्म सहते-सहते कब बैंडिट क्वीन बन गई, उसे खुद भी पता नहीं चला। दस साल की उम्र में शादी हो जाने पर अधेड़ पति की दरिंदगी सहते हुए वह किसी तरह भाग निकली और गांव आकर जुल्म करने वालों के खिलाफ आवाज उठानी शुरू की। इससे वह डकैतों तक जा पहुंची और सरदार बाबू गुज्जर और विक्रम मल्लाह के गिरोह क हाथ लग गई।


फूलन को लेकर बढ़ी तकरार में गुज्जर को मारकर विक्रम मल्लाह सरदार बन गया था। इस बीच फूलन काे अगवाकर बेहमई गांव में कई दिन तक सामूहिक दुष्कर्म किया गया और उसे निर्वस्त्र गांव में घुमाया गया, भूखे प्यासे रखा गया। इस अपमान का बदला लेने के लिए फूलन डकैतों के बीच बंदूक उठा ली। 14 फरवरी 1981 को फूलनदेवी ने बेहमई गांव के कुएं पर बीस लोगों को कतार में खड़ा करके गोलियों से भूनकर मौत के घाट उतारा तो देश दुनिया में बैंडिट क्वीन के नाम से सुर्खियों में छा गई।

डकैत गिरोह में थे आइजी और मेजर भी

बेहमई नरसंहार के बाद फूलनदेवी को गिरोह में इंस्पेक्टर कहा जाने लगा था, जबकि आइजी और मेजर पद भी डकैतों ने अपने नाम के आगे इस्तेमाल किए थे। डाकू मलखान सिंह हो या फूलन देवी या फिर विक्रम मल्लाह, सभी खाकी वर्दी ही पहनते थे, उसमें बाकायदा स्टार भी लगे होते थे। पुलिस से बचने के साथ ही गांवों में लोगों के घर धावा बोल देते थे। वर्दीधारी होने से उनकी शिनाख्त नहीं हो पाती थी। कई बार तो बीहड़ में कांबिंग के दौरान पुलिस पार्टी खुद वर्दीधारियों को देखकर धोखा खा जाती थी। इसका फायदा उठाकर डकैत कई बार पुलिस पर हमलावर हो जाते थे।


कांबिंग में पुलिस डकैतों से रूबरू हुई तो ऐसे कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आए। डकैत गिरोह के सदस्य फूलन को इंस्पेक्टर नाम से बुलाते थे। डकैत मलखान सिंह को आइजी पदनाम दिया गया था। साल 2003 में पुलिस ने जालौन से लेकर आगरा तक बीहड़ में कांबिंग के साथ सुरागरसी शुरू की तो पता चला कि निर्भय गुर्जर खुद को वीर निर्भय गुर्जर आइपीएस कहता था और उसके साथी भी इसी नाम से उसका परिचय देते थे। रज्जन गुर्जर के गिरोह का साथी भदही मेजर कहलाता था। उसका नाम मेजर इसलिए पड़ा क्योंकि वह गिरोह की एलएमजी लेकर चलता था।

डकैतों को उनकी रणनीति से ही किया काबू

कांबिंग में सीखे डकैतों के तौर-तरीके कांबिंग के दौरान पुलिस टीम ने डकैतों के तौर-तरीके, बोली-भाषा को समझा और सीखा ताकि डकैतों को धोखा दे सके। कई बार तो पुलिस उन्हें इस तरह संबोधित करते थे कि डकैत धोखा खा जाते थे कि उनके साथी हैं या नहीं। बहरहाल पुलिस की रणनीति कारगर रही और 2006 तक पुलिस ने बीहड़ डकैतों के चंगुल से आजाद करा लिया।


उस समय एंटी डकैती टीम के सदस्य रहे मौजूदा समय डीएसपी अरुण कुमार बताते हैं साल 2003 से 2006 तक एडीजी दलजीत चौधरी संग टीम में साथ रहकर डकैतों का सफाया किया था। उस दौरान डकैतों के इन पदनामों की जानकारी मिली थी। उस वक्त करीब 55 डकैत मारे गए थे। अब बीहड़ डकैतों के चंगुल से मुक्त है।

पुलिस ने कराया समर्पण, सपा ने दिया राजनीतिक कॅरियर

फूलन गिरोह ने मध्य प्रदेश सरकर में तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह के सामने सरेंडर कर दिया। फूलन पर 22 लोगों की हत्या, 30 डकैती और 18 अपहरण के आरोप थे और उसे जेल में रहना पड़ा था। 1993 में उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह की सरकार ने फूलन पर लगे आरोपों को वापस लिया और 1994 में उसे जेल से रिहाई मिली थी। इसके बाद फूलन ने उम्मेद सिंह से शादी की और समाजवादी पार्टी से राजनीतिक सफर शुरू किया।


वर्ष 1996 में समाजवादी पार्टी की टिकट पर चुनाव लड़कर फूलन सांसद बनीं। 1998 में हार गईं लेकिन 1999 में एक बार फिर जीतकर संसद पहुंची। 25 जुलाई 2001 को शेर सिंह राणा ने गोली मारकर फूलन की हत्या कर दी थी। राणा ने गिरफ्तारी के समय कहा था कि उसने बेहमई कांड का बदला लिया है।

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