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Saturday, October 31, 2020

घटस्फोटामुळे चर्चेत आले ‘हे’ मराठी कलाकार


 घटस्फोट घेणं हा कुणासाठीच आनंदाचा निर्णय नसतो. त्यामुळे संपूर्ण कुटुंब दुखावलं जातं, उद्ध्वस्त होऊ शकतं. पण म्हणून आयुष्यभर स्वत:ची फरफट करून दु:खी आयुष्य ओढत नेणं हे आता अनेकजण टाळू लागले आहेत. मराठी कलाविश्वातील कोणत्या कलाकारांनी घटस्फोट घेतला ते पाहुयात..


सई ताम्हणकर- अमेय गोसावी सई ताम्हणकरने २०१३ मध्ये व्हिज्युअल आर्टिस्ट अमेय गोसावीशी लग्न केलं होतं. मात्र हे लग्न केवळ दोनच वर्ष टिकलं. २०१५ मध्ये सईने अमेयला घटस्फोट दिला.


पियुष रानडे - शाल्मली तोळ्ये 'अस्मिता' फेम अभिनेता पियुष रानडे व शाल्मली तोळ्ये हे लग्नापूर्वी एकमेकांचे चांगले मित्र होते. २०१० मध्ये दोघांनी लग्नगाठ बांधली पण लग्नाच्या चार वर्षांनंतर २०१४ मध्ये त्यांनी घटस्फोट घेतला. पियुषने नंतर २०१७ मध्ये अभिनेत्री मयुरी वाघशी लग्न केलं.


रेशम टिपणीस - संजीव सेठ रेशम टिपणीसने वयाच्या विसाव्या वर्षी संजीव सेठशी लग्न केलं होतं. त्यावेळी संजीव ३२ वर्षांचा होता. ११ वर्षांच्या संसारानंतर २००४ मध्ये दोघांनी विभक्त होण्याचा निर्णय घेतला.


नंतर संजीवने २०१० मध्ये 'ये रिश्ता क्या कहलाता है' मालिकेतील सहअभिनेत्री लता सभरवालशी लग्नगाठ बांधली. रेशम आणि संजीवला दोन मुलं आहे.


स्वप्निल जोशी - अपर्णा जोशी मराठी चित्रपटसृष्टीचा चॉकलेट बॉय अर्थात अभिनेता स्वप्नील जोशीने २००५ मध्ये अपर्णाशी लग्न केलं होतं. लग्नाच्या चार वर्षांनंतर २००९ मध्ये ते विभक्त झाले. नंतर स्वप्नीलने २०११ मध्ये लीना आराध्येशी लग्न केलं.


तेजश्री प्रधान - शशांक केतकर 'होणार सून मी या घरची' या मालिकेच्या सेटवर तेजश्री प्रधान व शशांक केतकर एकमेकांच्या प्रेमात पडले. २०१४ मध्ये दोघांनी लग्न केलं पण लग्नाच्या वर्षभरातच त्यांनी घटस्फोटाचा निर्णय घेतला.


नंतर शशांकने प्रियांका ढवळेशी लग्न केलं.


गिरीश ओक 'अग्गंबाई सासूबाई' या मालिकेमुळे चर्चेत असलेले अभिनेते गिरीश ओक यांनी पद्मश्री पाठक यांच्याशी लग्न केलं होतं. या दोघांना गिरीजा ओक ही मुलगी आहे. घटस्फोटानंतर गिरीश यांनी पल्लवी ओकशी दुसरं लग्न केलं.


Friday, October 30, 2020

आखिर दो भागों में क्यों कटी होती है सांपों की जीभ? महाग्रंथ में छिपा है इस गहरे रहस्य का राज

 सांपों को देखकर ही कई लोगों की सिट्टी-पिट्टी गुम हो जाती है। आपने भी अपनी जिंदगी में कई सांप देखे होंगे और इतना तो जरूर जानते होंगे कि सांप की जीभ आगे से दो हिस्सों में बंटी हुई होती है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि ऐसा क्यों है? सांपों की जीभ दो भागों में कटी हुई होने के पीछे एक गहरा रहस्य छुपा हुआ है, जिसका उल्लेख महाभारत में मिलता है। महर्षि वेदव्यास द्वारा लिखी गई महाभारत में सांपों की जीभ से जुड़ी एक बहुत ही रोचक कथा है।



महाभारत के अनुसार, महर्षि कश्यप की 13 पत्नियां थीं। इनमें से कद्रू भी एक थी। सभी नाग कद्रू की ही संतान हैं। वहीं, महर्षि कश्यप की एक अन्य पत्नी का नाम विनता था, जिनके पुत्र पक्षीराज गरुड़ हैं। एक बार महर्षि कश्यप की दोनों पत्नियों कद्रू और विनता ने एक सफेद घोड़ा देखा। उसे देखकर कद्रू ने कहा कि इस घोड़े की पूंछ काली है और विनता ने कहा कि नहीं सफेद है। इस बात पर दोनों में शर्त लग गई।

तब कद्रू ने अपने नाग पुत्रों से कहा कि वो अपना आकार छोटा करके घोड़े की पूंछ से लिपट जाएं, ताकि घोड़े की पूंछ काली नजर आए और वह शर्त जीत जाएं। उस समय कुछ नाग पुत्रों ने ऐसा करने से मना कर दिया। तब कद्रू ने अपने पुत्रों को ही शाप दे दिया कि तुम राजा जनमेजय के यज्ञ में भस्म हो जाओगे। शाप की बात सुनकर सभी नाग पुत्र अपनी माता के कहेनुसार उस सफेद घोड़े की पूंछ से लिपट गए, जिससे उस घोड़े की पूंछ काली दिखाई देने लगी।


शर्त हारने के कारण विनता कद्रू की दासी बन गईं। जब विनता के पुत्र गरुड़ को ये बात पता चली कि उनकी मां दासी बन गई है तो उन्होंने कद्रू और उनके नाग पुत्रों से पूछा कि तुम्हें मैं ऐसी कौन सी वस्तु लाकर दूं, जिससे कि मेरी माता तुम्हारे दासत्व से मुक्त हो जाएं। तब नाग पुत्रों ने कहा कि तुम हमें स्वर्ग से अमृत लाकर दोगे तो तुम्हारी माता हमारी माता के दासत्व से मुक्त हो जाएंगी।

नागपुत्रों के कहने पर गरुड़ स्वर्ग से अमृत कलश ले आए और उसे कुशा (एक प्रकार की धारदार घास) पर रख दिया। उन्होंने सभी नागों से कहा कि अमृत पीने से पहले सभी स्नान करके आएं। गरुड़ के कहने पर सभी नाग स्नान करने चले गए, लेकिन इसी बीच देवराज इंद्र वहां आ गए और अमृत कलश लेकर वापस स्वर्ग चले गए।



जब सभी नाग स्नान करके आए तो उन्होंने देखा कि कुशा पर अमृत कलश नहीं है। इसके बाद सांपों ने उस घास को ही चाटना शुरू कर दिया, जिस पर अमृत कलश रखा था। उन्हें लगा कि इस जगह पर अमृत का थोड़ा अंश जरूर गिरा होगा। ऐसा करने से उन्हें अमृत ही प्राप्ति तो नहीं हुई, लेकिन घास की वजह ही उनकी जीभ के दो टुकड़े हो गए।


Thursday, October 29, 2020

Kojagari Laxmi Puja 2020 Date: इस दिन आसमान से बरसेगा अमृत, दिवाली से पहले होगी कोजागरी लक्ष्मी पूजा

 


Kojagari Laxmi Puja 20202 Date: धार्मिक दृष्टि से 30 अक्टूबर शुक्रवार का दिन बेहद खास रहने वाला है। इस दिन आश्विन मास की पूर्णिया तिथि है, जिसे शरद पूर्णिमा भी कहा जाता है। शरद पूर्णिमा के दिन कोजागरी लक्ष्मी पूजा होती है, जो दिवाली से लगभग 15 दिन पूर्व ही होता है। कोजागरी लक्ष्मी पूजा दिवाली से पूर्व माता लक्ष्मी की पूजा करने का शुभ अवसर होता है। बंगाल में इसे लक्ष्मी पूजा कहा जाता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, माता लक्ष्मी का अवतर शरद पूर्णिमा के दिन ही हुआ था। इस दिन माता लक्ष्मी देर रात में पृथ्वी पर भ्रमण करती हैं। आइए जानते हैं शरद पूर्णिमा के दिन होने वाली कोजागरी लक्ष्मी पूजा के बारे में।

कोजागरी लक्ष्मी पूजा का मुहूर्त

कोजागरी लक्ष्मी पूजा 30 अक्टूबर को है। इस दिन शरण पूर्णिमा या आश्विन पूर्णिमा तिथि का प्रारंभ शाम को 05 बजकर 45 मिनट पर हो रहा है, जो 31 अक्टूबर शनिवार को रात 08 बजकर 18 मिनट तक है। ऐसे में कोजागरी पूजा 30 को रात में होगी। शरद पूर्णिमा भी 30 को है।



कोजागरी लक्ष्मी पूजा का निशिता समय

30 अक्टूबर को देर रात 11 बजकर 39 मिनट से देर रात 12 बजकर 31 मिनट के बीच कोजागरी लक्ष्मी पूजा करनी चाहिए। यह पूजा देर रात में ही होती है क्योंकि माता लक्ष्मी देर रात में ही पृथ्वी पर भ्रमण करती हैं। इस दिन कोजागरी पूजा का कुल समय 52 मिनट का प्राप्त हो रहा है। कोजागरी पूजा के दिन चंद्रमा का उदय शाम को 05 बजकर 11 मिनट पर होगा।

कोजागरी पूजा का अर्थ

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, कोजागरी पूर्णिमा या शरद पूर्णिमा की रात्रि में माता लक्ष्मी जब धरती पर विचरण करती हैं तो 'को जाग्रति' शब्द का उच्चारण करती हैं। इसका अर्थ होता है कौन जाग रहा है। वो देखती हैं कि रात्रि में पृथ्वी पर कौन जाग रहा है। जो लोग माता लक्ष्मी की पूरी श्रद्धा से पूजा करते हैं, उनके घर मां लक्ष्मी जरुर जाती हैं।

कोजागरी पूजा का महत्व

ऐसी मान्यता है कि शरद पूर्णिमा के दिन कोजागरी लक्ष्मी पूजा करने से दरिद्रता दूर होती है। घर-परिवार में सुख-समृद्धि आती है।



कोजागरी पूर्णिमा या शरद पूर्णिमा

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, शरद पूर्णिमा या कोजागरी पूर्णिमा के दिन चंद्रमा 16 कलाओं से पूर्ण होता है। उसकी किरणों में अमृत के गुण होते हैं। इस दिन चंद्रमा की किरणों से अमृत वर्षा होती है। उस दिन आसमान से अमृत बरसता है, इसलिए रात में खीर बनाकर खुले में रखा जाता है। जब उसमें चंद्रमा की किरणें पड़ती हैं, तो वह भी अमृत के समान हो जाता है। उसका सेवन करना सेहत के लिए अच्छा माना जाता है।

Wednesday, October 28, 2020

क्या आपको भूलने की है बीमारी? याद्दाश्त बढ़ाने में ये ड्रिंक्स आपके आएंगे काम

 

भूलने की बीमारी या जल्दी कुछ याद नहीं रहना दिमाग से जुड़ी समस्या है

अगर आप याद्दाश्त को बढ़ाना चाहते हैं तो कुछ ड्रिंक्स मुफीद हो सकते हैं।




हम अपनी रोजाना की व्यस्त जिंदगी में अपने लिए वक्त नहीं निकाल पाते और कब हमारी सेहत खराब हो जाती है पता ही नहीं चलता. सेहतमंद रहने के लिए जरूरी है कि हम ऐसे फूड का सेवन करें जिससे शरीर और दिमाग ऊर्जावान रहे. अगर आपको भूलने की बीमारी है या जल्दी कुछ याद नहीं होता है तो ये ड्रिंक्स मुफीद साबित हो सकते हैं. दिमागी सेहत को बेहतर बनाने के अलावा ड्रिंक्स के पीने से याद्दाश्त भी तेज हो जाएगी.

अनार का जूस



अनार एंटी ऑक्सीडेंट्स से भरपूर फल होता है. इसका सेवन शरीर में खून की रफ्तार को बेहतर करता है. जिसकी वजह से दिमाग तक ऑक्सीजन की पर्याप्त सप्लाई होती है और इस तरह हमारा दिमाग ठीक से काम करने लगता है. अनार का जूस पीने का एक फायदा ये भी है कि ब्लड में शर्करा का स्तर नहीं बढ़ता, जबकि अन्य फलों  जूस पीने से बढ़ता है.


चुकंदर का जूस



आम तौर पर हम सलाद में चुकंदर को बिल्कुल नजर अंदाज कर देते हैं लेकिन अगर आप उसके फायदे जान लें तो रोजाना इस्तेमाल करने पर मजबूर हो जाएंगे. चुकंदर एक ऐसी सब्जी है जिसमें एंटी ऑक्सीडेंट्स, विटामिन, फाइबर बहुत ज्यादा पाए जाते हैं. उसके जूस को फूड में शामिल करने से आपका इम्यून सिस्टम मजबूत होता है. चुकंदर में मौजूद नाइट्रिक एसिड खून के बहाव को बेहतर करता है. जिससे दिमाग के काम करने की क्षमता में बढ़ोतरी होती है.


ग्रीन टी



ग्रीन टी याद्दाश्त को मजबूत करने में बेहद मददगार साबित होती है. उसमें पाया जानेवाला एंटी ऑक्सीडेंट्स और एमिनो एसिड बेचैनी और दबाव की स्थिति को कम करता है और याद्दाश्त की ताकत में इजाफे का कारण बनता है. ग्रीन टी में एल-थियानिन नाम का एक यौगिक भी भरपूर मात्रा में पाया जाता है. एल-थियानिन आपके शरीर में मौजूद स्ट्रेस हार्मोन 'कॉर्टिसोल' का स्तर घठाने का काम करता है.



Tuesday, October 27, 2020

खौलते हुए तेल में हाथ डालकर पकवान बना रही ये महिला, वीडियो वायरल

 


सोशल मीडिया पर इन दिनों एक वीडियो तेजी से वायरल हो रहा है जिसमें महिला कड़ाही में गर्म तेल में हाथों से ही पकवान बनाते ही नजर आ रही हैं. महिला इस दौरान उबलते हुए तेल में हाथ भी डाल रही है फिर भी उसका हाथ नहीं जल रहा है. वीडियो देखकर लोगों को आश्चर्य हो रहा है कि क्या सच में ऐसा संभव है?



जी हां ये पूरी तरह सच है. 13 सेकंड की क्लिप में एक बुजुर्ग महिला को उबलते गर्म तेल के एक बड़े पैन के बगल में खड़ा दिखाया गया है. चिमटे या दूसरे बर्तन का उपयोग करने के बजाय, महिला अपनी उंगलियों का उपयोग पैन में पक रहे पकवान को घुमाने के लिए कर रही है.



वीडियो में महिला अपने हाथ में कुछ गर्म तेल लेती है और दर्शकों को दिखाती है कि वह बिल्कुल ठीक महसूस कर रही है.

वायरल टिकटॉक वीडियो को ट्विटर अकाउंट फर्स्ट वी फेस्ट द्वारा साझा किया गया था. उन्होंने वीडियो को, 'चिमटे हारे हुए (सिक) लोगों के लिए हैं' कैप्शन के साथ शेयर किया.

Monday, October 26, 2020

एक ही फ्रेम में नजर आई धर्मेंद्र की दोनों पत्नियां, हेमा मालिनी के बगल में यूं खड़ी दिखी सनी देओल की मम्मी

 इस फोटो में धर्मेंद्र (dharmendra) की दोनों पत्नी प्रकाश कौर (prakash kaur) और हेमा मालिनी (hema malini) एक साथ नजर आ रही है। फोटो में हेमा, प्रकाश कौर के बगल में खड़ी बेहद खुश नजर आ रही है। ये फोटो किसी फंक्शन का है, जिसमें कई सेलेब्स शामिल हुए थे। 



धर्मेंद्र ने 2 शादियां की और वो पिछले कई सालों से दोनों पत्नियों के साथ बैलेंस बनाकर चल रहे हैं। धर्मेंद्र की पहली शादी 19 साल की उम्र में हुई थी। 1954 में उन्होंने प्रकाश कौर से शादी की थी। इस शादी से उन्हें 4 बच्चे अजय सिंह यानी की सनी देओल, विजय सिंह यानी बॉबी देओल और दो बेटियां विजेता, अजेता हैं।



इसके बाद धर्मेंद्र ने दूसरी शादी हेमा मालिनी से 2 मई, 1980 को की थी। इस शादी से उन्हें दो बेटियां हैं। ईशा और आहना। ईशा फिल्मों में काम कर चुकी हैं और फिलहाल अपनी फैमिली के साथ वक्त बीता रही हैं और फिल्मों से दूर हैं। वहीं, आहना ने कभी भी फिल्मों में काम करने की नहीं सोची। वे एक बेहतरीन क्लासिकल डांसर है।


हेमा मालिनी से शादी के बाद धर्मेंद्र की लाइफ में कई सारी समस्याएं आईं। उनकी पहली पत्नी प्रकाश कौर से उनके रिश्ते पहले जैसे नहीं रहे थे। मीडिया रिपोर्ट्स में कहा जाता है कि धर्मेंद्र ने हेमा मालिनी से शादी पहली पत्नी से बिना तलाक लिए ही की थी और इसके लिए उन्होंने अपना धर्म भी बदल लिया था।


हाल ही में स्पॉटब्वॉय से बात करते हुए हेमा मालिनी ने कहा कि शादी के बाद उन्हें और धर्मेंद्र को एक साथ रहने का बहुत कम समय मिला। हेमा से जब पूछा गया कि उनकी जिंदगी में कुछ ऐसा है जो वो बदलना चाहती हैं? इस पर एक्ट्रेस ने कहा- मुझे नहीं लगता मुझे कुछ भी बदलना है, मुझे शादी के बाद धरम जी के साथ ज्यादा वक्त बिताने का मौका नहीं मिला, लेकिन ठीक है।


हेमा ने बताया- जो भी समय हमने साथ बिताया है वो बहुत खास है और मेरे लिए कीमती हैं। हम जब कभी साथ रहे मैंने उन्हें कभी ये नहीं कहा कि ये क्यों नहीं किया? वो क्यों नहीं किया? लेट कैसे हो गए? मैं कभी अपने प्रियजनों के साथ बैठकर उनकी शिकायत नहीं करती हूं।


एक इंटरव्यू में हेमा ने धर्मेंद्र से शादी करने के अपने फैसले के बारे में बात की थी। उन्होंने बताया था कि वो अपने प्यार की वजह से कभी किसी को चोट नहीं पहुंचाना चाहती थीं। धर्मेंद्र की पहली पत्नी को भी नहीं और इसलिए, उन्होंने कभी भी उनके जीवन में दखल नहीं दिया। उन्होंने धर्मेंद्र को उनकी पहली पत्नी और बच्चों से कभी दूर नहीं किया।


हेमा, धर्मेन्द्र से शादी कर उनकी दूसरी पत्नी बनी, लेकिन शादी के बाद वह कभी धर्मेंद्र के घर नहीं गईं। इस बात का खुलासा राम कमल मुखर्जी की बुक हेमा मालिनी : बियॉन्ड द ड्रीम गर्ल में किया गया है। किताब के अनुसार, हेमा ने धर्मेंद्र से शादी जरूर की, लेकिन वे उनकी दूसरी फैमिली (पहली पत्नी प्रकाश कौर और बच्चे) को डिस्टर्ब नहीं करना चाहती थीं।


शादी से पहले हेमा, प्रकाश कौर से कई बार समारोह में मिली थीं। लेकिन शादी के बाद दोनों के रास्ते अलग हो गए। हेमा ने बताया था- मैं किसी को डिस्टर्ब नहीं करना चाहती थी। धरमजी ने मेरे और मेरी बेटियों के लिए लिए जो किया, मैं उसमें खुश हूं। उन्होंने एक पिता की भूमिका बखूबी निभाई। आज मैं काम करती हूं और अपनी डिग्निटी को मेंटेन करने में सक्षम हूं। क्योंकि मैंने अपनी जिंदगी को आर्ट और कल्चर से जोड़ लिया है। मुझे लगता है कि अगर सिचुएशन इससे थोड़ी भी अलग होती तो मैं आज वहां न होती, जहां हूं।

Tuesday, October 20, 2020

महिलाओं को रहना है स्वस्थ तो एक उम्र के बाद इस तरह के टेस्ट करा लेने में है भलाई

 ई बार देखा जाता है कि महिलाएं घर-परिवार और काम की जिम्मेदारियों के बीच अपने स्वास्थ्य को लेकर लापरवाही बरतने लगती हैं। जिसका नतीजा होता है कि कुछ ही सालों बाद वो बीमार रहना शुरू कर देती हैं। महिलाएं परिवार की रीढ़ होती हैं। इसलिए जरूरी है कि वो खुद की सेहत का भी उतना ही ख्याल रखें जितना कि अपने परिवार का। ऐसे में जरूरी है कि कुछ तरह के टेस्ट सही समय पर करवा लिए जाएं, जिससे की भविष्य में होने वाली बीमारियों से बचने का उपाय मिल जाए और आप स्वस्थ, खुशहाल जिंदगी जिएं। तो चलिए जानें वो कौन से टेस्ट हैं जिन्हें महिलाओं को 30 से 35 की उम्र के बाद जरूर करवाने चाहिए।




पेल्विक एग्जाम

30 की उम्र को पार करने के बाद आपको पेल्विक एग्जाम की जांच जरूर करवानी चाहिए। यह जांच यूटरस की सही स्थिति का पता लगाने के लिए किया जाता है।




पैप टेस्ट

इसके अलावा आपको पैप टेस्ट हर साल करवाना चाहिेए। यह जांच सर्वाइकल कैंसर को पता करने के लिए किया जाता है। टेस्ट पॉजिटिव आने पर समय रहते प्राथमिक स्टेज में ही इसका इलाज करवाना जरूरी होता है। 



ब्रेस्ट कैंसर

स्तन कैंसर महिलाओं में होने वाली एक गंभीर समस्या है। इस बीमारी में प्रारंभिक लक्षणों का आभास नहीं हो पाता। स्तन कैंसर की जांच आपको हर तीन वर्ष में नियमित तौर पर करवानी चाहिए। इस जांच को महिलाएं मेमोग्राफी तकनीक से करवा सकती हैं।



स्किन की जांच

स्तन कैंसर की तरह महिलाओं के लिए स्किन कैंसर भी एक गंभीर बीमारी है। इससे बचने के लिए महिलाओं को इसकी जांच करवानी चाहिए। इससे आप समय रहते इसके खतरे से बच सकती हैं। 




कोलेस्ट्रॉल

शरीर में खून में कॉलेस्ट्रॉल के स्तर की जांच करवाना बेहद जरूरी है। इनका असामान्य होना, कई गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं का कारण बना सकता है।


ब्लडप्रेशर

ब्लडप्रेशर कई तरह की समस्याएं पैदा करता है। महिलाओं को नियमित तौर पर इसकी जांच करवाते रहनी चाहिए और इसे नियंत्रित रखना चाहिए। ऐसा नहीं करने से इसके चलते दूसरी समस्याएं बढ़ सकती हैं।





भारत में पाए जाने वाले सबसे अच्छी नस्ल के कुत्ते कौन से होते हैं

 


कुत्तों की वफादारी के बारे में तो आपने सुना ही होगा कुत्ते जितने वफादार होते हैं उसने ही समझदार भी होते हैं लेकिन कुत्तों के बारे में कई ऐसी बातें हैं क्यों आप नहीं जानते आज इस आर्टिकल में हम आपको वही बातें बताएंगे।




इसके अलावा हम आपको पांच ऐसे कुत्तों के बारे में बताएंगे जो सबसे ताकतवर और बाकी कुत्तों की तुलना में बहुत ही अधिक शक्तिशाली और समझदार हैं।



1पिट बुल टेरियर- इसमें सबसे पहला नाम आता है पिट बुल टेरियर का यह कुत्ता बहुत ही समझदार और ताकतवर होता है इसकी सुनने की क्षमता  बाकी के कुत्तों से ज्यादा होती है।



2 अमेरिकन स्टेफर्डशायर टेरियर -यह कुत्ता भी पिटबुल की तरह ही होता है लेकिन यह उन से ज्यादा चंचल और प्यारा दिखता है और यह भी बहुत ही ताकतवर होता है।



 3 डॉबरमेन पिंचर -   यह कुत्ता देखने में थोड़ा डरावना होता है लेकिन यह आसानी से घुल मिल जाता है कि नहीं ज्यादा पुलिस स्क्वाड में सुनने के लिए रखा जाता है।



 पुलिस में इन कुत्तों को एक खास ट्रेनिंग के बाद ही शामिल किया जाता है।




4 रॉटवेलर्स -रॉटवेलर्स को ‘बुचर्स डॉग’ भी कहा जाता था। यह इसलिए कि इनसे बुचर्ड मीट के कार्ट को खींचने का काम लिया जाता था. ये मुख्य रूप से जर्मनी से हैं. यह एक वर्सेटाइल डॉग है और इससे कई तरह के काम लिए जाते हैं।



5 डोगो अर्जेंटीनो- डोगो अर्जेंटीनो नस्ल के कुत्तों का प्रजनन मुख्य रूप से अर्जेंटीना में ही होता है।



इन्हें गेम हंटिंग के लिए जाना जाता है. ये बड़े जानवरों से लड़ भी सकते हैं और उन्हें मार भी सकते हैं।

एक रात में बनी थी , चाँद बावड़ी- एक स्वर्णिम अतीत जिस पर इतिहास लगभग मौन हैं

 

चांद बावड़ी आभानेरी का इतिहास |राजपूत सम्राट मिहिरभोज प्रतिहार द्वारा निर्मित चांद बावड़ी आभानेरी का इतिहास |chand Bawadi Aabhaneri Rajasthan




एक रात में बनी थी राजस्थान की चांद बावड़ी, भूलभुलैया की 3500 सीढ़ीयों के साथ छिपाए हुए है कई रहस्य

राजस्थान का इतिहास रहस्यों से भरा पड़ा है । यहां अनगिनत ऐसे उदाहरण है जो आज भी लोगों के लिए रहस्य ही बने हुए हैं । ऐसे ही रहस्यों के बीच नाम आता है विश्व की सबसे बड़ी और सिर्फ एक रात में ही तैयार की गई राजस्थान की चांद बावड़ी का । राजस्थान में जयपुर से 95 किमी दूरी पर स्थित आभानेरी गाँव में विश्व की सबसे बड़ी बावड़ी (सीढ़ियों वाला गहरा कुँआ) स्थित है, जिसका नाम है “चाँद बावड़ी”। चाँद बावड़ी का निर्माण 9वीं शताब्दी में सम्राट मिहिरभोज परिहार ने करवाया था जिसे राजा चाँद भी कहते थे । ये बावड़ी बहुत सारे रहस्यों से अटी पड़ी है । तो चलिए बताते हैं आपको ऐतिहासिक चांद बावड़ी का रहस्यों के बारे में

3000 साल पूराना है आभानेरी गांव

चांद बावड़ी आभानेरी गांव में स्थित है और बात की जाये तो आभानेरी गांव की तो खुद आभानेरी गांव चांद बावड़ी से भी कई हजारों साल पूराना इतिहास रखता है । दौसा जिले का ह्रदय कहे जाने वाले सिकंदरा कस्बे से उत्तर की ओर कुछ ही किलोमीटर की दूरी पर आभानेरी गांव है । पुरातत्व विभाग को प्राप्त अवशेषों से ज्ञात जानकारी के अनुसार आभानेरी गाँव 3000 वर्ष से भी अधिक पुराना है ।


किसने बनवाई चांद बावड़ी

ऐतिहासिक चांद बावड़ी का निर्माण 9वीं शताब्दी में क्षत्रिय राजपूत वंश के महान सम्राट मिहिरभोज परिहार (महाराजा चांद) ने करवाया था । इन्हीं के नाम पर इस विशाल बावड़ी का नाम चांद बावड़ी पड़ा । इस बावड़ी को लेकर कई किवदंतियां हैं कि इस बावड़ी का निर्माण भूत प्रेतों ने करवाया था । ये बावड़ी इतनी गहरी है कि इसमें यदि कोई वस्तु गिर भी जाये, तो उसे वापस पाना असम्भव है।

भूल-भुलैया के लिए मशहूर

बावड़ी में 250 एक समान सीढ़ियों की भूल-भुलैया है। कहा जाता है कि कोई सीढ़ियों पर सिक्के रखकर भी वापस आना-जाना चाहे तो चूक तय है। एक फिल्म की शूटिंग के दौरान आए गोविंदा ने भी इसे स्वीकारा। किंवदंती है कि एक बार एक बारात यहां आई और बावड़ी में मौजूद अंधेरी-उजाली गुफा में उतर गई। इसके बाद बाहर नहीं आई। कहते हैं चांदबावड़ी, अलूदा की बावड़ी और भांडारेज की बावड़ी को एक रात में बनाया गया। ये तीनों सुरंग से एक-दूसरे से जुडी हैं


पूरे काम्प्लेक्स चांदनी रात जैसी दुधिया रोशनी सा चमकता हैं, हवा का झोंका शीतलता को महसूस करवाता हैं। यह स्मारक भारत के उतार-चढाओं युक्त इतिहास साक्षी रहा हैं। इसका निर्माण निकुम्भ राजवंश के राजा चाँद या चन्द्र ने करवाया था। जो 8वीं – 9वीं शती ईस्वी में आभानेरी या प्राचीन आभानगरी पर शासन करता था। 19.5 मीटर गहरी यह बावड़ी योजना में वर्गाकार हैं तथा इसका प्रवेशद्वार उतर की और हैं। नीचे उतरने के लिए इसमें तीन तरफ से दोहरे सोपान की व्यवस्था हैं जबकि उत्तरी भाग में स्तंभों पर आधारित एक बहुमंजिली दीर्घा बनाई गई हैं। इस दीर्घा से प्रक्षेपित दो मंडपों में महिषासुरमर्दिनी एवं गणेश की सुन्दर प्रतिमाएं प्रतिष्ठित हैं.

बावड़ी में है गुप्त सुरंग

तीन मंजिला इस बावडी में नृत्य कक्ष व गुप्त सुरंग बनी हुई है जिसकी लंबाई लगभग 17 कि.मी. है, जो पास ही स्थित गांव भांडारेज में निकलती है। बावडी की सुरंग के बारे में भी ऐसा सुनने में आता है कि इसका उपयोग युद्ध या अन्य आपातकालीन परिस्थितियों के समय राजा या सैनिकों द्वारा किया जाता था। लगभग पाँच-छह वर्ष पूर्व हुई बावडी की खुदाई एवं जीर्णोद्धार में भी एक शिलालेख मिला है जिसमें कि राजा चाँद का उल्लेख मिलता है।


चांद बावड़ी में चार चांद लगाता है हर्षद माता मंदिर


(श्रद्धालु मंदिर में पूजा करते हुए)

मंदिर में स्थापित वर्तमान मूर्ति, 1968 में तस्करों द्वारा चोरी की हर्षत माता की नीलम धातु की मुख्य मूर्ति के बाद स्थापित की गई हैं। बहुमूल्य धातु की अन्य मूर्तियां भी यहां से चोरी की गई।


मंदिर की बाहरी दीवार पर भद्र-ताखों में ब्राह्मण देवी-देवताओं की प्रतिमाएं उत्कीर्ण हैं। ऊपरी प्लेटफार्म के चहरों और ताखों में रखी सुन्दर मूर्तियाँ जीवन के धार्मिक एवं कौकिक दृश्यों को दर्शाती हैं।



(भगवान शिव पार्वती के साथ बैठे हैं)

संकट के बारे में पहले ही अवगत करवा देती है माता

स्थानीय निवासियों से बात करने पर ऐसा भी पता चलता है कि माता गाँव पर आने वाले संकट के बारे में पहले ही चेतावनी दे दिया करती थी जिससे स्थानीय निवासी सतर्क हो जाते थे एवं परेशानियों का बखूबी सामना कर लिया करते थे। ऐसा भी सुनने में आता है कि 1021-26 के दौरान मोहम्मद गजनवी ने मंदिर एवं इसके परिसर में तोड-फ़ोड की तथा मूर्तियों को भी क्षतिग्रस्त कर दिया था। वे खण्डित मूर्तियाँ आज भी मंदिर एवं बावडी परिसर में सुरक्षित रखी हुई हैं। बाद में 18वीं सदी में जयपुर महाराजा ने इसका जीर्णोद्धार करवाया था।


बलुए पत्थर में बना सप्तपात्रिका पट्ट जिसमें वीनाधारी वीरभद्र (शिव का प्रतिरूप) के साथ सप्तमातृकाएं बनी हैं. मातृकाओं में माहेश्वरी, वैष्णवी, वाराही कौमारी, इन्द्राणी एवं चामुंडा हैं जबकि ब्राह्मणी फलक में मौजूद नहीं है. मार्कंडेय पुराण के दुर्गा सप्तशती प्रकरण मेबं प्रमुख शक्ति रूपों की चर्चा हुई हैं, जिनका प्राकट्य महिषासुर वध के लिए होता हैं. भारतीय मूर्तिकला में, 7वीं-13वीं शती के बीच जब देश में तंत्र पूजा की लोकप्रियता बढ़ी तो ऐसी मूर्तियाँ बड़ी संख्या में बनी.




रावण, कैलाश पर्वत उठाने का प्रयास करते हुए जिस पर शिव – पार्वती विराजमान हैं।

इस मूर्ति में देवी महिषासुर नामक राक्षस का वध करते हुए।

महमूद गजनवी ही हर्षद माता मंदिर का विध्वंशक था?

इस भव्य मन्दिर को विदेशी लूटेरे महमूद गजनवी (सन 1021-26) ने तहस-नहस किया था। यहां हजारों खंडित मूर्तियां इस बात का साक्षी है। बाद में स्थानीय लोगों ने पत्थरों को पुनः जोड़कर इसका निर्माण कराया। आभानेरी प्राचीन आगरा – अजमेर मार्ग पर स्थित हैं। जो मुग़लों के लिए आम रास्ता था। इसलिए मुग़लों में बावड़ी के चारों ओर बरामदेनुमा आरामगाह का निर्माण करवाया।

बावड़ी की स्थानीय जीवन में क्या महत्व था?

स्थानीय लोग मंदिर में पूजा के दौरान चाँद बावड़ी में स्नान करते हैं। बावड़ी में स्नान करना पवित्र माना जाता हैं। यानी धार्मिक संस्कारों के निर्वाह में बावड़ी में स्नान को आवश्यक माना हैं। बावड़ी के पैंदे में देवताओं की मूर्ति भी इस क्रम में स्थापित की गई थी।

यह क्षेत्र शुष्क जलवायु में आता हैं। वर्षा जल संरक्षण के लिए भी इसका निर्माण हुआ हैं। ताकि पीने के लिए भी इसके जल का इस्तेमाल होता रहे। उल्लेखनीय हैं कि यह बावड़ी बाणगंगा नदी से 2 किमी दूर हैं। जो दिखाता हैं कि हमारे पूर्वज जल संरक्षण के प्रति कितनी सजग थे।

हॉलीवुड और बॉलीवुड में चाँद बावड़ी?

हॉलीवुड व बॉलीवुड भी नहीं रहे दूर

आभानेरी अंग्रेजी और हिन्दी फिल्मों में भी छाई हुई है। अंग्रेजी फिल्म ‘द फ़ॉल’ व प्रसिद्ध हिन्दी फिल्म ‘भूल भूलैया’ सहित अन्य कई फिल्मों की शूटिंग यहां हो चुकी है। चांद बावड़ी की सीढ़ियों पर कई कलाकार भी थिरक चुके हैं।



वापसी में सिकंदरा के पत्थर तराशों के प्रति में मन सम्मान से बढ़ गया, उन्होंने अपनी विरासत को जी तोड़ मेहनत से आगे बढ़ाया हैं। सुखद यादों के साथ भारतीय इतिहास के स्वर्णिम झरोखे से गुजरने का एहसास लिए मैं पुनः लौट आया।

चाँद बावड़ी कैसे पहुँचा जाएँ?

जयपुर – आभानेरी के बीच दूरी लगभग 95 किमी हैं जिसे 2 घंटे में तय किया जा सकता हैं। यहाँ से निकटवर्ती रेल्वे स्टेशन बांदीकुई 6 किमी हैं जो जयपुर-दिल्ली रेलवे लाइन पर स्थित हैं।