चांद बावड़ी आभानेरी का इतिहास |राजपूत सम्राट मिहिरभोज प्रतिहार द्वारा निर्मित चांद बावड़ी आभानेरी का इतिहास |chand Bawadi Aabhaneri Rajasthan
एक रात में बनी थी राजस्थान की चांद बावड़ी, भूलभुलैया की 3500 सीढ़ीयों के साथ छिपाए हुए है कई रहस्य
राजस्थान का इतिहास रहस्यों से भरा पड़ा है । यहां अनगिनत ऐसे उदाहरण है जो आज भी लोगों के लिए रहस्य ही बने हुए हैं । ऐसे ही रहस्यों के बीच नाम आता है विश्व की सबसे बड़ी और सिर्फ एक रात में ही तैयार की गई राजस्थान की चांद बावड़ी का । राजस्थान में जयपुर से 95 किमी दूरी पर स्थित आभानेरी गाँव में विश्व की सबसे बड़ी बावड़ी (सीढ़ियों वाला गहरा कुँआ) स्थित है, जिसका नाम है “चाँद बावड़ी”। चाँद बावड़ी का निर्माण 9वीं शताब्दी में सम्राट मिहिरभोज परिहार ने करवाया था जिसे राजा चाँद भी कहते थे । ये बावड़ी बहुत सारे रहस्यों से अटी पड़ी है । तो चलिए बताते हैं आपको ऐतिहासिक चांद बावड़ी का रहस्यों के बारे में
3000 साल पूराना है आभानेरी गांव
चांद बावड़ी आभानेरी गांव में स्थित है और बात की जाये तो आभानेरी गांव की तो खुद आभानेरी गांव चांद बावड़ी से भी कई हजारों साल पूराना इतिहास रखता है । दौसा जिले का ह्रदय कहे जाने वाले सिकंदरा कस्बे से उत्तर की ओर कुछ ही किलोमीटर की दूरी पर आभानेरी गांव है । पुरातत्व विभाग को प्राप्त अवशेषों से ज्ञात जानकारी के अनुसार आभानेरी गाँव 3000 वर्ष से भी अधिक पुराना है ।
किसने बनवाई चांद बावड़ी
ऐतिहासिक चांद बावड़ी का निर्माण 9वीं शताब्दी में क्षत्रिय राजपूत वंश के महान सम्राट मिहिरभोज परिहार (महाराजा चांद) ने करवाया था । इन्हीं के नाम पर इस विशाल बावड़ी का नाम चांद बावड़ी पड़ा । इस बावड़ी को लेकर कई किवदंतियां हैं कि इस बावड़ी का निर्माण भूत प्रेतों ने करवाया था । ये बावड़ी इतनी गहरी है कि इसमें यदि कोई वस्तु गिर भी जाये, तो उसे वापस पाना असम्भव है।
भूल-भुलैया के लिए मशहूर
बावड़ी में 250 एक समान सीढ़ियों की भूल-भुलैया है। कहा जाता है कि कोई सीढ़ियों पर सिक्के रखकर भी वापस आना-जाना चाहे तो चूक तय है। एक फिल्म की शूटिंग के दौरान आए गोविंदा ने भी इसे स्वीकारा। किंवदंती है कि एक बार एक बारात यहां आई और बावड़ी में मौजूद अंधेरी-उजाली गुफा में उतर गई। इसके बाद बाहर नहीं आई। कहते हैं चांदबावड़ी, अलूदा की बावड़ी और भांडारेज की बावड़ी को एक रात में बनाया गया। ये तीनों सुरंग से एक-दूसरे से जुडी हैं
पूरे काम्प्लेक्स चांदनी रात जैसी दुधिया रोशनी सा चमकता हैं, हवा का झोंका शीतलता को महसूस करवाता हैं। यह स्मारक भारत के उतार-चढाओं युक्त इतिहास साक्षी रहा हैं। इसका निर्माण निकुम्भ राजवंश के राजा चाँद या चन्द्र ने करवाया था। जो 8वीं – 9वीं शती ईस्वी में आभानेरी या प्राचीन आभानगरी पर शासन करता था। 19.5 मीटर गहरी यह बावड़ी योजना में वर्गाकार हैं तथा इसका प्रवेशद्वार उतर की और हैं। नीचे उतरने के लिए इसमें तीन तरफ से दोहरे सोपान की व्यवस्था हैं जबकि उत्तरी भाग में स्तंभों पर आधारित एक बहुमंजिली दीर्घा बनाई गई हैं। इस दीर्घा से प्रक्षेपित दो मंडपों में महिषासुरमर्दिनी एवं गणेश की सुन्दर प्रतिमाएं प्रतिष्ठित हैं.
बावड़ी में है गुप्त सुरंग
तीन मंजिला इस बावडी में नृत्य कक्ष व गुप्त सुरंग बनी हुई है जिसकी लंबाई लगभग 17 कि.मी. है, जो पास ही स्थित गांव भांडारेज में निकलती है। बावडी की सुरंग के बारे में भी ऐसा सुनने में आता है कि इसका उपयोग युद्ध या अन्य आपातकालीन परिस्थितियों के समय राजा या सैनिकों द्वारा किया जाता था। लगभग पाँच-छह वर्ष पूर्व हुई बावडी की खुदाई एवं जीर्णोद्धार में भी एक शिलालेख मिला है जिसमें कि राजा चाँद का उल्लेख मिलता है।
चांद बावड़ी में चार चांद लगाता है हर्षद माता मंदिर
(श्रद्धालु मंदिर में पूजा करते हुए)
मंदिर में स्थापित वर्तमान मूर्ति, 1968 में तस्करों द्वारा चोरी की हर्षत माता की नीलम धातु की मुख्य मूर्ति के बाद स्थापित की गई हैं। बहुमूल्य धातु की अन्य मूर्तियां भी यहां से चोरी की गई।
मंदिर की बाहरी दीवार पर भद्र-ताखों में ब्राह्मण देवी-देवताओं की प्रतिमाएं उत्कीर्ण हैं। ऊपरी प्लेटफार्म के चहरों और ताखों में रखी सुन्दर मूर्तियाँ जीवन के धार्मिक एवं कौकिक दृश्यों को दर्शाती हैं।
(भगवान शिव पार्वती के साथ बैठे हैं)
संकट के बारे में पहले ही अवगत करवा देती है माता
स्थानीय निवासियों से बात करने पर ऐसा भी पता चलता है कि माता गाँव पर आने वाले संकट के बारे में पहले ही चेतावनी दे दिया करती थी जिससे स्थानीय निवासी सतर्क हो जाते थे एवं परेशानियों का बखूबी सामना कर लिया करते थे। ऐसा भी सुनने में आता है कि 1021-26 के दौरान मोहम्मद गजनवी ने मंदिर एवं इसके परिसर में तोड-फ़ोड की तथा मूर्तियों को भी क्षतिग्रस्त कर दिया था। वे खण्डित मूर्तियाँ आज भी मंदिर एवं बावडी परिसर में सुरक्षित रखी हुई हैं। बाद में 18वीं सदी में जयपुर महाराजा ने इसका जीर्णोद्धार करवाया था।
बलुए पत्थर में बना सप्तपात्रिका पट्ट जिसमें वीनाधारी वीरभद्र (शिव का प्रतिरूप) के साथ सप्तमातृकाएं बनी हैं. मातृकाओं में माहेश्वरी, वैष्णवी, वाराही कौमारी, इन्द्राणी एवं चामुंडा हैं जबकि ब्राह्मणी फलक में मौजूद नहीं है. मार्कंडेय पुराण के दुर्गा सप्तशती प्रकरण मेबं प्रमुख शक्ति रूपों की चर्चा हुई हैं, जिनका प्राकट्य महिषासुर वध के लिए होता हैं. भारतीय मूर्तिकला में, 7वीं-13वीं शती के बीच जब देश में तंत्र पूजा की लोकप्रियता बढ़ी तो ऐसी मूर्तियाँ बड़ी संख्या में बनी.
रावण, कैलाश पर्वत उठाने का प्रयास करते हुए जिस पर शिव – पार्वती विराजमान हैं।
इस मूर्ति में देवी महिषासुर नामक राक्षस का वध करते हुए।
महमूद गजनवी ही हर्षद माता मंदिर का विध्वंशक था?
इस भव्य मन्दिर को विदेशी लूटेरे महमूद गजनवी (सन 1021-26) ने तहस-नहस किया था। यहां हजारों खंडित मूर्तियां इस बात का साक्षी है। बाद में स्थानीय लोगों ने पत्थरों को पुनः जोड़कर इसका निर्माण कराया। आभानेरी प्राचीन आगरा – अजमेर मार्ग पर स्थित हैं। जो मुग़लों के लिए आम रास्ता था। इसलिए मुग़लों में बावड़ी के चारों ओर बरामदेनुमा आरामगाह का निर्माण करवाया।
बावड़ी की स्थानीय जीवन में क्या महत्व था?
स्थानीय लोग मंदिर में पूजा के दौरान चाँद बावड़ी में स्नान करते हैं। बावड़ी में स्नान करना पवित्र माना जाता हैं। यानी धार्मिक संस्कारों के निर्वाह में बावड़ी में स्नान को आवश्यक माना हैं। बावड़ी के पैंदे में देवताओं की मूर्ति भी इस क्रम में स्थापित की गई थी।
यह क्षेत्र शुष्क जलवायु में आता हैं। वर्षा जल संरक्षण के लिए भी इसका निर्माण हुआ हैं। ताकि पीने के लिए भी इसके जल का इस्तेमाल होता रहे। उल्लेखनीय हैं कि यह बावड़ी बाणगंगा नदी से 2 किमी दूर हैं। जो दिखाता हैं कि हमारे पूर्वज जल संरक्षण के प्रति कितनी सजग थे।
हॉलीवुड और बॉलीवुड में चाँद बावड़ी?
हॉलीवुड व बॉलीवुड भी नहीं रहे दूर
आभानेरी अंग्रेजी और हिन्दी फिल्मों में भी छाई हुई है। अंग्रेजी फिल्म ‘द फ़ॉल’ व प्रसिद्ध हिन्दी फिल्म ‘भूल भूलैया’ सहित अन्य कई फिल्मों की शूटिंग यहां हो चुकी है। चांद बावड़ी की सीढ़ियों पर कई कलाकार भी थिरक चुके हैं।
वापसी में सिकंदरा के पत्थर तराशों के प्रति में मन सम्मान से बढ़ गया, उन्होंने अपनी विरासत को जी तोड़ मेहनत से आगे बढ़ाया हैं। सुखद यादों के साथ भारतीय इतिहास के स्वर्णिम झरोखे से गुजरने का एहसास लिए मैं पुनः लौट आया।
चाँद बावड़ी कैसे पहुँचा जाएँ?
जयपुर – आभानेरी के बीच दूरी लगभग 95 किमी हैं जिसे 2 घंटे में तय किया जा सकता हैं। यहाँ से निकटवर्ती रेल्वे स्टेशन बांदीकुई 6 किमी हैं जो जयपुर-दिल्ली रेलवे लाइन पर स्थित हैं।











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