Kumbh Mela 2021 :
12 साल में एकबार क्यों आता है कुंभ, जानें रहस्यमयी वजह
इस नियम के अनुसार कुंभ का पहला शाही स्नान शिवरात्रि यानी 11 मार्च को आयोजित होगा, दूसरा शाही स्नान 12 अप्रैल को सोमवती अमावस्या के दिन, चौथा शाही स्नान 27 अप्रैल चैत्र पूर्णिमा के दिन आयोजित होगा। लेकिन मुख्य स्नान 14 अप्रैल को होगा।
जानिए कुंभ से जुड़ी कुछ पौराणिक कथाओं के बारे में
कुंभ मेला केवल भारत में ही नहीं बल्कि दुनियाभर में प्रसिद्ध है। 14 जनवरी से लगने जा रहा कुंभ पर्व का प्रारंभ कब से हुआ, इसका ठीक-ठाक निर्णय कर पाना कठिन है क्योंकि वेदों में कुंभ पर्व का आधार केवल सूत्रों-मंत्रों में वर्णित किया गया, जबकि पुराणों में इससे जुड़ी कुछ कथाओं के बारे में बताया गया है। लेकिन कुंभ का आयोजन जिस वर्ष, जिस राशि पर सूर्य, चंद्रमा, और बृहस्पति का संयोग होता है, उसी वर्ष, उसी राशि के योग में जहां-जहां अमृत की बूंदें गिरी थीं, वहां-वहां कुंभ मेले का आयोजन किया जाता है। साल 2021 में वैशाख संक्रांति के समय सूर्य, चंद्रमा मेष राशि में तथा बृहस्पति कुंभ राशि में होंगे, इस वजह से कुंभ का आयोजन हरिद्वार में किया जाएगा। आइए जानते हैं कुंभ से जुड़ी कुछ कथाओं के बारे में, जिनका वर्णन पुराणों में किया गया है…
कुंभ की पहली कथा
दुनिया के लिए कुंभ मेला किसी वरदान से कम नहीं है लेकिन कुंभ की उत्पत्ति की कथा में एक ऋषि का शाप भी है और वह हैं महर्षि दुर्वासा। कथा के अनुसार, महर्षि दुर्वासा ने एक दिव्य माला देवराज इंद्र को दी थी। देवताओं के राज होने की वजह से घमंड में चूर इंद्र ने उस माला को अपने ऐरावत हाथी के मस्तक पर रख दिया था। ऐरावत के मस्तक से माला गिर गई और उसने अपने पैरों से माला को रौंद डाला। महर्षि दुर्वासा ने इसे अपना अपमान समझा और क्रोध में आकर इंद्र को शाप दे दिया। इससे सारे संसार में हाहाकार मच गया। भगवान विष्णु की कृपा से सागर मंथन का आयोजन किया गया, जिसमें से माता लक्ष्मी और अमृत निकला। देव-दानव के विवाद में अमृत की कुछ बूंदे धरती पर गिरीं, जिसकी वजह से कुंभ मेला लगने की परंपरा शुरू हुई। कुंभ मेले के पीछे महर्षि दुर्वासा का शाप भी एक निर्णायक घटना थी।
कुंभ की दूसरी कथा
प्रजापति दक्ष की दो पुत्रियों कद्रू और विनता की शादी कश्यप ऋषि से ब्याही गई थीं। एकबार दोनों में विवाद हो गया कि सूर्य के अश्व काले हैं या सफेद। दोनों में शर्त लगी कि जिसकी बात झूठी निकलेगी, वही दासी बन जाएगी। यह तय किया गया कि दोनों बहनें अगले दिन यह पता करने जाएंगी। कद्रू ने अपने पुत्रों को आदेश दिया कि वे जाकर अश्व की पूंछ पर लिपट जाएं, जिससे उसकी पूंछ काली लगे। दोनों बहनें फिर साथ गईं और अश्व को देखकर विनता हार गईं और परिणाम स्वरूप दासी बनना पड़ा। उसके कुछ दिन बाद विनता के पुत्र गरुड़ का जन्म हुआ। विनता के साथ-साथ गरुड़ को भी पुत्र सर्पों की भी सेवा करनी पड़ती थी। जब गरुड़ ने अपनी और अपनी मां की इस दासता से मुक्ति के लिए पूछा तो सर्पों ने कहा कि वह नागलोक से अमृत कुंभ ला देगा तो इससे दासता मुक्त हो जाएगी। गरुड़ नागलोक के लिए निकल पड़े तो वासुकि ने इंद्र को सूचना दे दी। इंद्र ने गरुड़ पर चार बार आक्रमण किया और चारों प्रसिद्ध स्थानों पर कुंभ का अमृत छलका, जिससे कुंभ पर्व की शुरुआत हुई।
कुंभ की तीसरी कथा
कुंभ की तीसरी कथा मिलती है सागर मंथन की। सागर मंथन देवताओं और असुरों के बीच किया गया पहला काम था। समुद्र मंथन से 14 चीजों की प्राप्ति हुई थी, जिसको देवताओं और असुरों के बीच बांट लिया गया था। लेकिन अंत में निकले अमृत को लेकर दोनों के बीच संघर्ष शुरू हो गया। जिसकी वजह से अमृत की कुछ बूदें पृथ्वी पर गिर गईं। जहां-जहां अमृत छलका वहां-वहां कुंभ मेले का आयोजन शुरू हो गया।
12 साल में एकबार क्यों आता है कुंभ, जानें रहस्यमयी वजह
और राशि भ्रमण करते हुए उनको 12 साल का समय लग जाता है। इसलिए 12 साल बाद इन पवित्र स्थानों पर कुंभ मेले का आयोजन किया जाता है। कुंभ के लिए निर्धारित अलग-अलग स्थानों पर हर तीन साल बाद मेले का आयोजन होता है। बृहस्पति जब कुंभ राशि में और सूर्य मेष राशि में होते हैं, तब हरिद्वार में कुंभ का आयोजन शुरू जाएगा।





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